जीवन की भरी दुपहरी में बरगद के छाया जैसी माँ,
दुःख की काली बदली में रिमझिम सावन जैसी माँ!
गम की जो थोड़ी धुप पड़े आंचल की छाया देती माँ,
मेरे सारे रंजों गम को अपने सर ले लेती माँ!
जीवन की भरी दुपहरी……………………………..
मेरे गम से गमगीन रहे मै मुस्काऊ तो हंसती माँ,
बिन कहे सभी सुन लेती है जैसे मन में बसती माँ!
पहले मारे फिर खुद रोये चोट मेरी खुद सहती माँ,
बेसन की सोंधी रोटी पे खट्टी चटनी जैसी माँ!!
By- Deepak Pal
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